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Tuesday, February 7, 2017

*8 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति

👶🏻 *8 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति*

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💫8 फरवरी 1897 – डॉ. ज़ाकिर हुसैन (विद्वान, तृतीय राष्ट्रपति-भारत) का जन्म हुआ.

💫8 फरवरी 1925 – शोभा गुर्टू – प्रसिद्ध भारतीय ठुमरी गायिका

💫8 फरवरी 1941 – जगजीत सिंह, ग़ज़लों की दुनिया के बादशाह

💫8 फरवरी 1939 – जेम्स माइकल लिंगदोह – भारत के बारहवें ‘मुख्य चुनाव आयुक्त’.

💫8 फरवरी 1951 – अशोक चक्रधर – हिन्दी के मंचीय कवियों में से एक हैं.

💫8 फरवरी 1963 – मोहम्मद अज़रुद्दीन, क्रिकेटर

😢😟 *8 फ़रवरी को हुए निधन*

💫8 फरवरी 1265 – हुलेगु ख़ान -‘इलख़ानी साम्राज्य’ के संस्थापक थे.

💫8 फरवरी 1995 – कल्पना दत्त – आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाली महिला क्रांतिकारियों में से एक.

🌐 *8 फ़रवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाए*ं🚂

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💫8 फरवरी 1872- अंडमान जेल (सेल्यूलर जेल या ‘कालापानी’) में शेर अली ने गवर्नर पर हमला करके शहादत प्राप्त की.

💫8 फरवरी 1999 – अमेरिकी अंतरिक्ष यान स्टारडस्ट केनेडी अंतरिक्ष केंद्र से रवाना.

💫8 फरवरी 2002 – भारत व रूस के बीच चार रक्षा समझौते सम्पन्न, विमानवाहक पोत गोर्शकोव का सौदा अटका.

💫8 फरवरी 2005 – इस्रायल और फ़िलिस्तीन के बीच शर्म अल शेख़ (मिस्र) शिखर सम्मेलन में हिंसा समाप्त करने की घोषणा.

💫8 फरवरी 2006 – सिओल में भारत और दक्षिण कोरिया के बीच तीन समझौते सम्पन्न.

💫8 फरवरी 2007 – भूटान नरेश की प्रथम भारतीय यात्रा.

💫8 फरवरी 2008 – बैंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस के वरिष्ठ वैज्ञानिक शांतनु भट्टाचार्य को जी.डी. बिड़ाला पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

💫8 फरवरी  2008 -उड़ीसा के शिशुपालगढ़ में खुदाई के दौरान 2500 वर्ष पुराना शहर मिला.

💫8 फरवरी 2008 – अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में जॉन मैक्केन को रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया गया.

🍁अमेरिका के अंतरिक्ष यान अटलांटिस को फ़्लोरिडा के केनवाल से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र आईएसएस के लिए सफलतापूर्वक रवाना किया गया.

💫8 फरवरी 2009- हज़ारों पूर्व सैनिकों ने सरकार की बेरुखी से क्षुब्ध होकर अपने पदक राष्ट्रपति को लौटाए.

💫8 फरवरी 2010- श्रीनगर के पास खिलनमर्ग क्षेत्र में हिमस्खलन में सेना के हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल के 350 जवान बर्फ़ के नीचे दब गए.

🍁इनमें से 70 सैनिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया जबकि 11 सैनिकों के शव निकाले गए.

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Monday, February 6, 2017

7 फ़रवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाए

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🌐 _*7 फ़रवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाए*_ँ🚂

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☀1792 - आस्ट्रेलिया एवं प्रुशिया ने फ़्रांस के ख़िलाफ़ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये।

☀1831 - बेल्जियम में संविधान लागू।

☀1856 - नवाब वाजिद अली शाह द्वारा अवध राज्य का ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में शांतिपूर्ण विलयन।

☀1915 - चलती ट्रेन से पहली बार भेजा गया वायरलेस संदेश रेलवे स्टेशन को प्राप्त हुआ।

☀1962 -⤵

☀अमेरिका ने क्यूबा से सभी तरह के आयात पर रोक लगाई।

☀जर्मनी की एक कोयला खदान में विस्फोट से 298 मज़दूरों की मौत।

☀1983 - कोलकाता में ईस्टर्न न्यूज एजेंसी की स्थापना।

☀1987 - जापान द्वारा अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस (ए.एन.सी) को मान्यता।

☀1992 - स्वदेशी तकनीक से निर्मित पहली पनडुब्बी (आईएनएस शाल्की) को नौसेना में शामिल किया गया।

☀1997 - सं.रा. अमेरिका के स्टीफ़न स्क्यूवैल अगले तीन वर्ष हेतु अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अध्यक्ष चुने गये।

☀1999 - जार्डन के शाह हुसैन की मृत्यु, अब्दुला नये शाह बने।

☀2000 - भारत व सं.रा. अमेरिका के बीच गठित संयुक्त आतंकवाद विरोधी दल की प्रथम बैठक वाशिंगटन में शुरू।

☀2001 - इस्रायल के प्रधानमंत्री एहुद बराक चुनाव में पराजित, एरियल शेरोन नए प्रधानमंत्री बने।

☀2003 - फ़्रांस के प्रधानमंत्री ज्यां पियरे रैफ़रिन भारत यात्रा पर नई दिल्ली पहुँचे।

☀2006 - नेपाल में स्थानीय निकायों हेतु मतदान सम्पन्न।

2008 -⤵

🎈🎈केन्द्र सरकार ने सिमी पर प्रतिबन्ध की अवधि को बढ़ाया।

🎈🎈इक्वेडोर का तंगुराही ज्वालामुखी फटा।

☀2009 - राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को महाराष्ट्र के राज्यपाल एससी जमीर ने डी॰ लिट् की उपाधि से नवाजा।

2010 ⤵

🎈🎈 दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित 19वाँ अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला समाप्त हो गया।

🎈🎈नौ दिनों तक चले इस पुस्तक मेले में लगभग दो हज़ार प्रकाशकों ने भाग लिया।
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👼🏻👶🏻 _*7 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति*_

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☀1938 - एस. रामचंद्रन पिल्लै - मार्क्सवादी नेता

☀1908- मन्मथनाथ गुप्त- प्रमुख क्रान्तिकारी तथा लेखक
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😢😪 _*7 फ़रवरी को हुए निधन*_

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🔰1942 - शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी।

🔰2010 - डा. टी आर विनोद, पंजाबी के प्रसिद्ध आलोचक

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विश्व कैंसर दिवस

🌐Today 4/February🚂

🌑विश्व कैंसर दिवस🌑

आधुनिक विश्व में कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिससे सबसे ज़्यादा लोगों की मृत्यु होती है। विश्व में इस बीमारी की चपेट में सबसे अधिक मरीज़ हैं।

👉तिथि :4 फ़रवरी

👉शुरुआत:वर्ष2005

👉उद्देश्य:कैंसर से होने वाले नुकसान के बारे में बताना और लोगों को अधिक से अधिक जागरूक करना।

👉अन्य जानकारी:
कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज तो अभी तक मुमकिन नहीं हो पाया है पर इसे काबू करना और इससे बचाव संभव है।

विश्व कैंसर दिवस प्रत्येक वर्ष 4 फ़रवरी को मनाया जाता है। आधुनिक विश्व में कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिससे सबसे ज़्यादा लोगों की मृत्यु होती है। विश्व में इस बीमारी की चपेट में सबसे अधिक मरीज़ हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद कैंसर के मरीजों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है। इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हर साल 4 फरवरी को "विश्व कैंसर दिवस" की तरह मनाने का निर्णय लिया ताकि लोगों को इस भयानक बीमारी कैंसर से होने वाले नुकसान के बारे में बताया जा सकें और लोगों को अधिक से अधिक जागरूक किया जा सकें। ऐसा माना जा रहा है 2030 तक कैंसर के मरीजों की संख्या 1 करोड़ से भी अधिक हो सकती हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2005में 7.6 लाख लोग कैंसर से मौत के आगोश में समा गए थे। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के मरने से और विश्व स्तर पर इस बीमारी के फैलने से सब चिंतित हैं।

👉शुरुआत;
विश्व कैंसर दिवस के इतिहास के बारे में बात करें तो इसकी सही शुरुआत वर्ष 2005से हुई थी। और तब से यह दिन विश्व में कैंसर के प्रति निरंतर जागरुकता फैला रहा है।
भारतमें भी इस दिन सभी स्वास्थ्य संगठनों ने जागरुकता फैलाने का निश्चय लिया है। भारत उन देशों में काफ़ी आगे है जहां तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों की वजह से कैंसर के मरीजों की संख्या बहुत ज़्यादा है। कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज तो अभी तक मुमकिन नहीं हो पाया है पर इसे काबू करना और इससे बचाव संभव है। वैसे कैंसर हो जाने पर इससे छुटकारा पाना मुश्किल होता है पर नामुमकिन नहीं। मरीज़ अगर दृढ़ इच्छाशक्ति से इस बीमारी का सामना करे और सही समय पर इलाज मुहैया हो तो इलाज संभव हो जाता है। साथ ही हमेशा से माना जाता है कि उपचार से बेहतर है बचाव। इसी तरह कैंसर होने के बचे रहने में ज़्यादा समझदारी है।

👉सावधानियाँ;
कैंसर से बचने के लिए तंबाकू उत्पादों का सेवन बिलकुल न करें, कैंसर का ख़तरा बढ़ाने वाले संक्रमणों से बचकर रहें, चोट आदि होने पर उसका सही उपचार करें और अपनी दिनचर्या को स्वस्थ बनाए। कैंसर के ज़्यादातर मामलों में फेफड़े और गालों के कैंसर देखने में आते हैं, जो तंबाकू उत्पादों का अधिक सेवन करने का नतीजा होता है। ऐसे मामलों में उपचार बेहद जटिल हो जाता है और मरीज़ के बचने के चांस भी कम हो जाते हैं। इसके साथ ही आजकल महिलाओं में स्तन कैंसर काफ़ी ज़्यादा देखने में आ रहा है जो बेहद खतरनाक होने के साथ काफ़ी पीड़ादायक होता है। यदि सही समय पर अगर इसके लक्षणों को पहचान कर उपचार किया जाए तो इसका इलाज बेहद सरल बन जाता है। कैंसरसे सबसे ज़्यादा ख़तरा होता है युवाओं को जो आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में खुद को तनाव मुक्त रखने के लिए धूम्रपान का सहारा लेते हैं। विश्व को कैंसर मुक्त करने के लिए आप भी कदम बढ़ाएं और खुद तथा अपने सगे सबंधियों को तंबाकू, सिगरेट, शराब आदि से दूर रहने की सलाह दीजिए।

✋कैंसर ?कैंसर क्या है?, कैंसर क्यों होता हैं?
इसका इलाज क्या इत्यादि बातों को जानना जरूरी है।आइए जानें विश्व कैंसर दिवस पर कैंसर के बारे में कुछ और बातें।

👉कैंसर क्या होता है?
शरीर में कोशिकाओं के समूह की अनियंत्रित वृद्धि कैंसर है। जब ये कोशिकाएं टिश्यू को प्रभावित करती हैं तो कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है। कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है। लेकिन यदि कैंसर का सही समय पर पता ना लगाया गया और उसका उपचार ना ह तो इससे मौत का जोखिम बढ़ सकता है। कैंसर के कई प्रकार हैं या यूं कहें कि कैंसर के सौ से भी अधिक रूप है। जैसे- स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, ब्रेन कैंसर, बोन कैंसर, ब्लैडर कैंसर,पेंक्रियाटिक कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, गर्भाशय कैंसर, किडनी कैंसर, लंग कैंसर, त्वचा कैंसर, स्टमक कैंसर, थायरॉड कैंसर, मुंह का कैंसर, गले का कैंसर इत्यादि।

👉कैंसर के कारण:
कैंसर कई तरह का होता है और हर कैंसर के होने के अलग-अलग कारण हैं। लेकिन कुछ मुख्य कारक ऐसे भी हैं जिनसे कैंसर होने का ख़तरा किसी को भी हो सकता है। ये कारक हैं-
*.वजन बढ़ना या मोटापा।
*.अधिक शारीरिक सक्रियता ना होना।
*.एल्कोहल और नशीले पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करना।
*.कैंसर में पौष्टिक आहार ना लेना।

*.अपनी दिनचर्या में व्यायाम को शामिल ना करना।

& कैंसर के अन्य कारण:
*.कैंसर आनुवांशिक भी हो सकता है। कई बार कैंसर से पीडित माता या पिता के जीन बच्चे में भी आ जाते हैं जिससे बच्चे को भविष्य में कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है।
*.किसी गंभीर बीमारी के कारण भी आपको कैंसर हो सकता है। यानी यदि आप किसी गंभीर बीमारी के लिए दवाएं ले रहे हैं तो इन दवाओं के साइड इफेक्ट्स के कारण आप कैंसर के शिकार हो सकते हैं।

*.कई बार उम्र के बढ़ने के साथ भी शरीर में चुस्ती-फुर्ती नहीं रहती और उम्र के पड़ाव पर व्यक्ति बीमार पड़ने लगता है, ऐसे में कई बार कैंसर भी हो जाता है।

👉कुछ प्रमुख कैंसर:
क्या आप जानते हैं देश में सबसे अधिक होने वाली मौतों में कुछ कैंसर प्रमुख हैं-
*.महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर, गर्भाश्य कैंसर और सर्वाइकल कैंसर से सबसे अधिक मौतेहोते हैं।
*.पुरूषों में सबसे अधिक मौत फुस्फुस,आमाशय, यकृत, कोलेस्ट्रोल और ब्रेन कैंसर से होतीहै।
*.कैंसर से मरने वाले लोगों में महिलाओं का प्रतिशत पुरूषों से अधिक है।

बिरजू महाराज

🌐Today :- 04 / February 🚂

👤बिरजू महाराज👤
पूरा नाम:बृजमोहन नाथ मिश्रा
जन्म:4 फ़रवरी,1938
जन्म भूमि:लखनऊ,उत्तर प्रदेश
अविभावक:अच्छन महाराज
कर्म भूमि:भारत
कर्म-क्षेत्र:शास्त्रीय संगीतऔर नाट्य
पुरस्कार-उपाधि:'पद्म विभूषण' (1986), 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', 'कालिदास सम्मान'
प्रसिद्धि:शास्त्रीय नर्तक
विशेष योगदान:आपने कत्थक शैली में नृत्य रचना को जोड़कर उसे आधुनिक बना दिया है और नृत्य नाटिकाओं को भी प्रचलित किया है।
अन्य जानकारी:बिरजू महाराज की 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' पर भी अच्छी पकड़ है।ठुमरी, दादरा, भजन और गजल गायकी में उनका कोई जवाब नहीं है।

🎭बिरजू महाराज👯💃

बृजमोहन नाथ मिश्रा भारतके प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य कलाकारों में से एक हैं। वे भारतीय नृत्यकी 'कथक' शैली के आचार्य और लखनऊके 'कालका-बिंदादीन' घराने के एक मुख्य प्रतिनिधि हैं। ताल और घुँघुरूओं के तालमेल के साथ कथक नृत्य पेश करना एक आम बात है, लेकिन जब ताल की थापों और घुँघुरूओं की रूंझन को महारास के माधुर्य में तब्दील करने की बात हो तो बिरजू महाराज के अतिरिक्त और कोई नाम ध्यान में नहीं आता। बिरजू महाराज का सारा जीवन ही इस कला को क्लासिक की ऊँचाइयों तक ले जाने में ही व्यतीत हुआ है। उन्हेंभारतके दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' (1986) और 'कालीदास सम्मान' समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'खैरागढ़ विश्वविद्यालय' से 'डॉक्टरेट' की मानद उपाधि भी मिल चुकी है।

👶📖जन्म तथा शिक्षा:

बिरजू महाराज का जन्म 4 फ़रवरी, 1938 कोलखनऊ,उत्तर प्रदेशके 'कालका बिन्दादीन घराने' में हुआ था। पहले उनका नाम 'दुखहरण' रखा गया था, जो बाद में बदल कर 'बृजमोहन नाथ मिश्रा' हुआ।इनके पिताका नाम जगन्नाथ महाराज था, जो 'लखनऊ खराने' से थे और अच्छन महाराज के नाम से जाने जाते थे। अच्छन महाराज की गोद में महज तीन साल की उम्र में ही बिरजू की प्रतिभा दिखने लगी थी। इसी को देखते हुए पिता ने बचपन से ही अपने यशस्वी पुत्र को कला दीक्षा देनी शुरू कर दी। किंतु इनके पिता की शीघ्र ही मृत्यु हो जाने के बाद उनके चाचाओं, सुप्रसिद्ध आचार्यों शंभू और लच्छू महाराज ने उन्हें प्रशिक्षित किया। कला के सहारे ही बिरजू महाराज को लक्ष्मी मिलती रही। उनके सिर से पिता का साया उस समय उठा, जब वह महज नौ साल के थे।

💰💰विरासत:
भगवान श्रीकृष्णसे जुड़ा कत्थक नृत्य बिरजूमहाराज को विरासत में मिला। उनके पूर्वज ईश्वरी प्रसाद मिश्र इलाहाबादके हंडिया तहसील के रहने वाले थे और उन्हें कत्थक के पहले ज्ञात शिक्षक के रूप में जाना जाता है। इसी खानदान के ठाकुर प्रसाद नवाब वाजिद अलीशाह के कत्थक गुरु थे। कत्थक नृत्य के मामले में आज के समय में बिरजू महाराज का कोई सानी नहीं है। पिता अच्छन महाराज के साथ महज सात साल की उम्र में ही वह देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर अपनी प्रस्तुति देने लगे थे, लेकिन उनकी पहली एकल प्रस्तुति रही बंगालमें आयोजित 'मन्मथनाथ गुप्त समारोह' में, जहाँ उन्होंने 'शास्त्रीय नृत्य' के दिग्गजों के समक्ष अपनीनृत्य कलाका प्रदर्शन किया था। तभी उनकी प्रतिभा की झलक लोगों को मिल गई थी और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

🃏📖प्रशिक्षण कार्य:
उन्होंने नृत्य के पारंपरिक विषयों में जहाँ बोल्ड और बौद्धिक रचनाओं का समावेश किया वहीं उनकी समसामयिक कार्यों में भी ताजगी कूट कूटकर भरी है।पिताके देहांत के बाद ही बिरजू महाराज की गुरु बहन डॉ. कपिला वात्स्यायन उन्हें अपने साथ दिल्लीले आई थीं। उन्होंने तैरह साल की उम्र में ही दिल्ली के 'संगीत भारती' में नृत्य का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। उन्होंने 'भारतीय कला केंद्र' तथा 'संगीत नाटक अकादमी' से संबद्ध कत्थक केंद्र में भी नृत्य का प्रशिक्षण दिया।

1⃣🃏प्रथम प्रस्तुति:

मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही बिरजू महाराज ने अपनी प्रथम प्रस्तुति दी और 28 वर्ष की उम्र में कत्थक में उनकी निपुणता ने उन्हें 'संगीत नाटक अकादमी' का प्रतिष्ठित पुरस्कार दिलवाया। शास्त्रीय नृत्य में बिरजू महाराज फ़्यूजन से भी नहीं घबराए। उन्होंने लुई बैंक के साथ रोमियो और जुलियट की कथा को कत्थक शैली में प्रस्तुत किया।

🃏💃🎭👯हिन्दी फ़िल्मों से नाता:
बिरजू महाराज का बालीवुड से भी गहरा नाता रहा है। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों के गीतों का नृत्य निर्देशन किया। इनमें प्रख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रायकी शास्त्रीय कृति 'शतरंज के खिलाड़ी' भी शामिल है। इस फ़िल्म में उन्होंने दो शास्त्रीय नृत्य दृश्यों के लिये संगीत रचा और गायन भी किया। प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ाकी 'दिल तो पागल है', 'गदर एक प्रेम कथा' तथा संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'देवदास'का नाम भी इनमें प्रमुखता से लिया जा सकता है।

💃👯नृत्य शैली:
अपनी परिशुद्ध ताल और भावपूर्ण अभिनय के लिये प्रसिद्ध बिरजू महाराज ने एक ऐसी शैली विकसित की है, जो उनके दोनों चाचाओं और पिता से संबंधित तत्वों को सम्मिश्रित करती है। वह पदचालन की सूक्ष्मता और मुख व गर्दन के चालन को अपने पिता से और विशिष्ट चालों (चाल) और चाल के प्रवाह को अपने चाचाओं से प्राप्त करने का दावा करते हैं।

🃏नवीन प्रयोग:-
बिरजू महाराज ने राधा=कृष्ण अनुश्रुत प्रसंगों के वर्णन के साथ विभिन्न अपौराणिक और सामाजिक विषयों पर स्वंय को अभिव्यक्त करने के लिये नृत्यकी शैली में नूतन प्रयोग किये हैं। उन्होंने कत्थक शैली में नृत्य रचना, जो पहले भारतीय नृत्य शैली में एक अनजाना तत्त्व था, को जोड़कर उसे आधुनिक बना दिया है और नृत्य नाटिकाओं को प्रचलित किया है।

🃏शास्त्रीय गायक व वादक:
केवल नृत्य के क्षेत्र में ही बिरजू महाराज सिद्धहस्त नहीं हैं, बल्कि 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' पर भी उनकी गहरी पकड़ है।ठुमरी, दादरा, भजन और गजल गायकी में उनका कोई जवाब नहीं है। वे कई वाद्य यंत्रभी बखूबी बजाते हैं।तबले पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ है।इसके अतिरिक्त वह सितार,सरोदऔर सारंगीभी अच्छा प्रकार से बजा सकते हैं। ख़ास बात यह है कि उन्होंने इन वाद्य यंत्रों को बजाने की विधिवत शिक्षा नहीं ली है। एक संवेदनशील कवि और चित्रकार के रूप में भी उन्हें जाना जाता है।

🎁🎊🎉पुरस्कार व सम्मान:
बिरजू महाराज ने अपनी नृत्य प्रतिभा के बल पर कई पुरस्कार व सम्मान भी प्राप्त किए हैं। उन्हें भारतके दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से वर्ष 1986में सम्मानित किया गया था। 'कालीदास सम्मान' से भी वे नवाजे जा चुके हैं। उन्हें 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'खैरागढ़ विश्वविद्यालय' से डॉक्टरेट की मानद उपाधि भी मिल चुकी है। गत कई वर्षों में उन्होंने व्यापक रूप से भ्रमण किया है और कई प्रस्तुतियाँ व प्रदर्शन व्याख्यान दिए हैं।

(Special thanks :- " Bharat kosh " )

भीमसेन जोशी

🌐Today birthday🚂

🎻भीमसेन जोशी🎻

पूरा नाम:पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी
जन्म:4 फ़रवरी,1922
जन्म भूमि:गडग,कर्नाटक
मृत्यु:24 जनवरी,2011
मृत्यु स्थान:पुणे,महाराष्ट्र
अविभावक:गुरुराज जोशी
संतान:श्रीनिवास जोशी (पुत्र)
कर्म-क्षेत्र:शास्त्रीय गायन
मुख्य रचनाएँ:"मिले सुर मेरा तुम्हारा"
विषय:शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि:भारत रत्न,पद्म विभूषण,संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार,पद्म भूषण,पद्म श्री
प्रसिद्धि:हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक
अन्य जानकारी:पंडित जोशी "किराना" घरानेके गायक हैं। उन्हें उनके ख़्यालशैली और भजन गायन के विशेष रूप से जाना जाता है।

👐पंडित भीमसेन जोशी✋
(अंग्रेज़ी:Bhimsen Joshi; जन्म-4 फ़रवरी,1922, गड़ग,कर्नाटक; मृत्यु-24 जनवरी,2011,पुणे,महाराष्ट्र)"किराना" घरानेके महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय गायक थे। उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया था और वे सात दशकों तक शास्त्रीय गायन करते रहे। भीमसेन जोशी ने कर्नाटकको गौरवान्वित किया है। भारतीय संगीतके क्षेत्र में इससे पहले एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी,उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान,पंडित रविशंकर और लता मंगेशकरको 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी योग्यता का आधार उनकी महान संगीत साधना है। देश-विदेश में लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायकों में उनकी गिनती होती थी। अपने एकल गायन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतमें नए युग का सूत्रपात करने वाले पंडित भीमसेन जोशी कला और संस्कृतिकी दुनिया के छठे व्यक्ति थे, जिन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था। 'किराना घराने' के भीमसेन गुरुराज जोशी ने गायकी के अपने विभिन्न तरीकों से एक अद्भुत गायन की रचना की। देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने के बारे में जब उनके पुत्र श्रीनिवास जोशी ने उन्हें बताया था तो भीमसेन जोशी ने पुणे में कहा था कि-"मैं उन सभी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकों की तरफ से इस सम्मान को स्वीकार करता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी संगीत को समर्पित कर दी।"

👶जन्म: कर्नाटकके 'गड़ग' में 4 फ़रवरी,1922ई. को भीमसेन जोशी का जन्म हुआ था। उनके पिता'गुरुराज जोशी' स्थानीय हाई स्कूल के हेडमास्टर और कन्नड़,अंग्रेज़ी और संस्कृतके विद्वान थे। उनके चाचा जी.बी जोशी चर्चित नाटककार थे तथा उन्होंने धारवाड़ की मनोहर ग्रन्थमाला को प्रोत्साहित किया था। उनके दादा प्रसिद्ध कीर्तनकार थे।

🎻संगीत में रुचि:
भीमसेन जोशी जिस पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करते थे, वहाँ पाठशाला के रास्ते में
'भूषण ग्रामोफ़ोन शॉप' थी। ग्राहकों को सुनाए जा रहे गानों को सुनने के लिए किशोर भीमसेन खड़े हो जाते थे। एक दिन उन्होंने 'अब्दुल करीम ख़ान' का गाया 'राग वसंत' में 'फगवा' 'बृज देखन को' और 'पिया बिना नहि आवत चैन' ठुमरी सुनी। कुछ ही दिनों पश्चात उन्होंने कुंडगोल के समारोह में सवाई गंधर्व को सुना।मात्र ग्यारह वर्षीय भीमसेन के मन में उन्हें गुरु बनाने की इच्छा प्रबल हो उठी। पुत्र की संगीतमें रुचि होने का पता चलने पर इनके पिता गुरुराज ने 'अगसरा चनप्पा' को भीमसेन का संगीत शिक्षक नियुक्त कर दिया। एक बार पंचाक्षरी गवई ने भीमसेन को गाते हुए सुनकर चनप्पा से कहा, "इस लड़के को सिखाना तुम्हारे बस की बात नहीं, इसे किसी बेहतर गुरु के पास भेजो।"

👌✋गुरु की खोज:
एक दिन भीमसेन घर से भाग निकले। उस घटना को याद कर उन्होंने विनोद में कहा- "ऐसा करके उन्होंने परिवारकी परम्परा ही निभाई थी।" मंज़िल का पता नहीं था। रेल में बिना टिकट बैठ गये और बीजापुर तक का सफर किया। टी.टी. को राग भैरव में 'जागो मोहन प्यारे' और 'कौन-कौन गुन गावे' सुनाकर मुग्ध कर दिया। साथ के यात्रियों पर भी उनके गायन का जादू चल निकला। सहयात्रियों ने रास्ते में खिलाया-पिलाया। अंतत: वह बीजापुर पहुँच गये। गलियोंमें गा-गाकर और लोगों के घरों के बाहर रात गुज़ार कर दो हफ़्ते बीत गये। एक संगीत प्रेमी ने सलाह दी, ‘संगीत सीखना हो तो ग्वालियर जाओ।’भीमसेन जोशी उन्हें पता नहीं था कि ग्वालियर कहाँ है। वह एक अन्य ट्रेन पर सवार हो गये और इस बार पुणे,महाराष्ट्र पहुँच गये। उन्हें नहीं पता था कि एक दिन पुणे ही उनका स्थायी निवास स्थान बनेगा। रेल गाड़ियाँ बदलते और रेल कर्मियों से बचते-बचाते भीमसेन आख़िर ग्वालियर पहुँच गये। वहाँ के 'माधव संगीत विद्यालय' में प्रवेश ले लिया। किंतु भीमसेन को किसी कक्षाकी नहीं, एक गुरु की ज़रूरत थी। भीमसेन तीन साल तक गुरु की खोज में भटकते रहे। फिर उन्हें 'करवल्लभ संगीत सम्मेलन' में विनायकराव पटवर्धन मिले। विनायकराव को आश्चर्य हुआ कि सवाई गन्धर्व उसके घर के बहुत पास रहते हैं। सवाई गन्धर्व ने भीमसेन को सुनकर कहा, "मैं इसे सिखाऊँगा यदि यह अब तकका सीखा हुआ सब भुला सके।” डेढ़ साल तक उन्होंने भीमसेन को कुछ नहीं सिखाया। एक बार भीमसेन के पिता उनकी प्रगति का हाल जानने आए, उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह अपने गुरु के घर के लिए पानी से भरे बड़े-बड़े घड़े ढो रहे हैं। भीमसेन ने अपने पिता से कहा- "मैं यहाँ खुश हूँ। आप चिन्ता न करें।

🎻"पहला संगीत प्रदर्शन:वर्ष1941में भीमसेन जोशी ने 19 वर्ष की उम्र में मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी। उनका पहला एल्बम 20वर्षकी आयु में निकला, जिसमें कन्नड़ और हिन्दीमें कुछ धार्मिक गीत थे। इसके दो वर्ष बाद वह रेडियो कलाकार के तौर पर मुंबईमें काम करने लगे। अपने गुरु की याद में उन्होंने वार्षिक 'सवाई गंधर्व संगीत समारोह' प्रारम्भ किया था। पुणे में यह समारोह हर वर्ष दिसंबरमें होता है। भीमसेन के पुत्र भी शास्त्रीय गायक एवं संगीतकार हैं।बुलंद आवाज़ तथा संवेदनशीलता पंडित भीमसेन जोशी को बुलंद आवाज़, सांसों पर बेजोड़ नियंत्रण,संगीतके प्रति संवेदनशीलता, जुनून और समझ के लिए जाना जाता था। उन्होंने 'सुधा कल्याण', 'मियां की तोड़ी','भीमपलासी', 'दरबारी', 'मुल्तानी' और 'रामकली' जैसे अनगिनत रागछेड़ संगीत के हर मंच पर संगीत प्रमियों का दिल जीता। पंडित मोहनदेव ने कहा, "उनकी गायिकी पर केसरबाई केरकर, उस्ताद आमिर ख़ान,बेगम अख़्तरका गहरा प्रभाव था। वह अपनी गायिकी में सरगम और तिहाईयों का जमकर प्रयोग करते थे। उन्होंने हिन्दी,कन्नड़ और मराठीमें ढेरों भजन गाए थे।

🎁🎭💰पुरस्कार व सम्मान:
*.भीमसेन जोशी को1972में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
*.'भारत सरकार' द्वारा उन्हें कला के क्षेत्रमें सन1985में 'पद्म भूषण' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
*.पंडित जोशी को सन1999में 'पद्म विभूषण' प्रदान किया गया था।
*.4 नवम्बर,2008को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' भी जोशी जी को मिला।कला और संस्कृतिके क्षेत्र से संबंधित उनसे पहले सत्यजीत रे,कर्नाटक संगीतकी कोकिला एम.एस.सुब्बालक्ष्मी,पंडित रविशंकर,लता मंगेशकर और उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँको 'भारत रत्न' मिल चुका था। भीमसेन जोशी दूसरे शास्त्रीय गायक रहे, जिन्हें 'भारत रत्न' प्रदान किया गया था।
*.'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका था।

😇अविस्मरणीय संगीत:
पंडित भीमसेन जोशी को
"मिले सुर मेरा तुम्हारा"
के लिए याद किया जाता है, जिसमें उनके साथ बाल मुरली कृष्णा और लता मंगेशकरने जुगलबंदी की।1985से ही वे ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के जरिये घर-घर में पहचाने जाने लगे थे। तब से लेकर आज भी इस गाने के बोल और धुन पंडित जी की पहचान बने हुए हैं।

🎬फ़िल्मों के लिए गायन:
पंडित भीमसेन जोशी ने कई फ़िल्मों के लिए भी गाने गाए। उन्होंने ‘तानसेन’, ‘सुर संगम’, ‘बसंत बहार’ और ‘अनकही’ जैसी कई फ़िल्मों के लिए गायिकी की। पंडित जी शराब पीने के शौकीन थे, लेकिन संगीत कॅरियर पर इसका प्रभाव पड़ने पर 1979में उन्होंने शराब का पूरी तरह से त्याग कर दिया।

🎻किराना घराना:
किराना घराना विभिन्न घरानों के गुणों को मिलाकर भीमसेन जोशी अद्भुत गायन प्रस्तुत करते थे। जोशी जी किराना घरानेके सबसे प्रसिद्ध गायकों में से एक माने जाते थे। उन्हें उनकी "ख़्यालशैली" और भजन गायन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

😔निधन:
शास्त्रीय गायिकी के लिए अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले पंडित भीमसेन जोशी का निधन 24 जनवरी,2011को पुणे,महाराष्ट्रमें हुआ।

👉पंडित के विषय में कई लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं, जैसे-
*.‘हिन्दुस्तानी म्यूजिक टुडे’ किताब में लेखक दीपक एस राजा ने भीमसेन जोशी के लिए लिखा है कि "जोशी 20वीं सदी के सबसे महान शास्त्रीय गायकों में से एक थे। उन्होंने हिन्दी, कन्नड़ और मराठी में ख़्याल,ठुमरीऔर भजन गायन से तीन पीढ़ियों को आनंदित किया। उनकी अपनी अलग गायन शैलीथी।

*.राजा के अनुसार, "जोशी ने सवाई गंधर्व से गायिकी का प्रशिक्षण लिया था। उनके संगीत कॅरियर में एक से बढ़कर एक बेजोड़ उपलब्धियां शामिल हैं। जोशी जी 'ग्रामोफोन कंपनी ऑफ़ इंडिया' (एचएमवी) का 'प्लैटिनम पुरस्कार' पाने वाले एकमात्र भारतीय शास्त्रीय संगीत गायक थे।
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